The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026 | UPSC
दैनिक UPSC सिविल सेवा संपादकीय विश्लेषण • GS प्रश्नपत्र I, II & III व्यापक परीक्षा तैयारी नोट्स
📅 16 अक्टूबर 2026 • दैनिक संपादकीय विश्लेषण
The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026
आज का संपादकीय विश्लेषण UPSC CSE मुख्य परीक्षा हेतु तीन अनिवार्य विषयों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है: सी.बी.पी. श्रीवास्तव का महिला-नेतृत्व विकास मॉडल, जो कल्याणकारी खैरात से संपत्ति के अधिकार एवं सहदायिकी स्वामित्व के माध्यम से वितरक न्याय की ओर संवैधानिक बदलाव का आह्वान करता है; डॉ. कमर कुरैशी और डॉ. उमा रामकृष्णन के बीच पर्यावरण संवाद, जो इस बात का परीक्षण करता है कि क्या भारतीय वन्यजीव बिना मानवीय हस्तक्षेप के जीवित रह सकते हैं तथा किला संरक्षण और कानूनी अनुसंधान बाधाओं की समीक्षा करता है; और विश्व खाद्य दिवस 2026 पर संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों (FAO, IFAD, WFP) का संयुक्त आलेख, जो अंतिम छोर तक तकनीकी नवाचार और ग्लोबल साउथ खाद्य सुरक्षा के लिए भारत के मॉडल को रेखांकित करता है।
GS पेपर I & IIमहिला सशक्तिकरण व अधिकारसंवैधानिक कानून (अनुच्छेद 38, 39, 300A)वितरक न्याय बनाम प्रतिपूरक न्याय
महिला-नेतृत्व वाले विकास मॉडल को आगे बढ़ाना: प्रतिपूरक न्याय से वितरक न्याय, सहदायिकी संपत्ति अधिकार और कल्याणकारी सीमाओं का उन्मूलन
Prelims: अनुच्छेद 38, 39(b)(c), 300-A, हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005Mains: वितरक न्याय बनाम प्रतिपूरक न्याय, संपत्ति व क्षमता मॉडल, विनीता शर्मा निर्णयState PSCs: भूमि अभिलेख डिजिटलीकरण, स्वचालित नामांतरण व SHG विधिक साक्षरता
संवैधानिक उद्देश्य
प्रतिपूरक राहत के स्थान पर वितरक न्याय
ऐतिहासिक सहदायिकी निर्णय
जन्म से सहदायिक बेटी (विनीता शर्मा मामला)
विकसित भारत@2047 दृष्टिकोण
महिलाएं आर्थिक बदलाव की संप्रभु चालक
1 संपादकीय विमर्श: निष्क्रिय कल्याणकारी लाभार्थियों से आर्थिक समानता की ओर
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा महिलाओं के संपत्ति अधिकार और सामाजिक-आर्थिक न्याय पर आयोजित उच्चस्तरीय राष्ट्रीय परामर्श के बाद, शासन विशेषज्ञ सी.बी.पी. श्रीवास्तव ने The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026 में तर्क दिया है कि विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नीतिगत दृष्टिकोण में क्रांतिकारी बदलाव आवश्यक है। दशकों से भारत में महिला सशक्तिकरण को केवल प्रतिपूरक न्याय (Compensatory Justice) तक सीमित रखा गया है—जिसमें कल्याणकारी भत्ते, आरक्षण और उत्पीड़न से नकारात्मक सुरक्षा शामिल हैं। यद्यपि ये उपाय तात्कालिक संकट को कम करते हैं, किंतु ये समाज में गहराई से स्थापित पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देने में असमर्थ रहे हैं।
इसके विपरीत, भारतीय संविधान वितरक न्याय (Distributive Justice) को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। एयर इंडिया वैधानिक निगम बनाम यूनाइटेड लेबर यूनियन (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि प्रस्तावना के साथ-साथ अनुच्छेद 38, 39 और 46 आर्थिक व्यवस्था के पुनर्गठन की परिकल्पना करते हैं, ताकि धन के संकेंद्रण को रोका जा सके और भौतिक संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित हो। इसके अतिरिक्त, कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (1995) मामले में अदालत ने दोहराया कि सामाजिक-आर्थिक और वितरक न्याय अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग हैं। महिलाओं का सशक्तिकरण राज्य द्वारा दी जाने वाली कोई खैरात नहीं हो सकता; यह कानूनी रूप से लागू होने योग्य संपत्ति का अधिकार होना चाहिए।
2 कानूनी तुलनात्मक मैट्रिक्स: प्रतिपूरक राहत बनाम वितरक अधिकार
विश्लेषण का आयाम
प्रतिपूरक न्याय ढांचा (Compensatory)
वितरक न्याय ढांचा (Distributive)
संवैधानिक व व्यावहारिक प्रभाव
मूल दर्शन
ऐतिहासिक शोषण और उत्पीड़न के प्रभाव को कम करता है; महिलाओं को सरकारी अनुदानों की निष्क्रिय लाभार्थी मानता है
आर्थिक स्वामित्व और सामाजिक स्थिति का पुनर्गठन करता है; महिलाओं को विकास की संप्रभु चालक के रूप में मान्यता देता है
नीतियों को कल्याणकारी दयाभाव से निकालकर समान संवैधानिक साझेदारी में परिवर्तित करता है
संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 17, 23 (अस्पृश्यता व बंधुआ मजदूरी उन्मूलन); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) धारा 396 (पीड़ित मुआवजा)
अनुच्छेद 38, 39(b), 39(c), अनुच्छेद 46 (नीति निदेशक तत्व) और अनुच्छेद 300-A (संवैधानिक संपत्ति का अधिकार)
यह स्थापित करता है कि भौतिक संपत्ति का अभाव ही महिलाओं की असुरक्षा और सामाजिक दासता का मूल कारण है
संपत्ति व उत्तराधिकार
गुजारा भत्ता, सशर्त नकद हस्तांतरण और वैवाहिक विच्छेद की स्थिति में अस्थायी राहत राशि
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत पैतृक संपत्ति में महिलाओं को समान सहदायिकी (Coparcenary) अधिकार
*विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020)*: पुष्टि की गई कि बेटी का सहदायिकी अधिकार जन्म से है, पिता का जीवित होना आवश्यक नहीं
जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन
नौकरशाही द्वारा वितरित सब्सिडी; भारी लीकेज और लगातार पितृसत्तात्मक बिचौलियों का नियंत्रण
भूमि अभिलेखों का संपूर्ण डिजिटलीकरण, सरलीकृत स्वचालित नामांतरण (Mutation) और अनिवार्य संयुक्त/एकल स्वामित्व
पितृसत्तात्मक बिचौलियों को समाप्त करता है; महिलाओं की संस्थागत साख और निर्णय लेने की क्षमता में भारी वृद्धि करता है
3 महिला-नेतृत्व आर्थिक परिवर्तन हेतु रणनीतिक रोडमैप
स्तंभ 01
स्वचालित भूमि नामांतरण
राजस्व अभिलेखों को डिजिटल नागरिक रजिस्ट्रियों से जोड़ना ताकि बेटियों और विधवाओं के कानूनी उत्तराधिकार शेयर का बिना किसी स्थानीय हस्तक्षेप के स्वतः दाखिल-खारिज हो सके।
स्तंभ 02
स्वयं सहायता समूह विधिक साक्षरता
महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के पैरा-लीगल स्वयंसेवकों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को सहदायिकी अधिकार लागू करने का प्रशिक्षण देना।
स्तंभ 03
संस्थागत बोर्डों में अनिवार्य भागीदारी
कृषि सहकारी समितियों, भूमि प्रबंधन निकायों और ग्रामीण वित्तीय संस्थानों के निदेशक मंडलों में महिलाओं का अनिवार्य नेतृत्व सुनिश्चित कर पितृसत्तात्मक बाधाओं को तोड़ना।
🎯 Prelims अभ्यास प्रश्नभारतीय राजव्यवस्था एवं संवैधानिक अधिकार
प्रश्न: भारत में संपत्ति के अधिकारों और संवैधानिक न्यायशास्त्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति का अधिकार पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान रूप से गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) में निर्णय दिया कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत बेटी जन्म से ही सहदायिक (Coparcener) है, भले ही संशोधन लागू होने के समय पिता जीवित रहे हों या नहीं।
3. एयर इंडिया वैधानिक निगम (1996) के न्यायिक निर्णय के अनुसार, प्रस्तावना और राज्य के नीति निदेशक तत्वों से उद्भूत 'वितरक न्याय' को एक आधारभूत संवैधानिक लक्ष्य माना गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: B (केवल 2 और 3) व्याख्या: कथन 1 गलत है: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के बाद संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा (अनुच्छेद 19(1)(f) और 31 निरस्त कर दिए गए) और यह अनुच्छेद 300-A के तहत केवल एक संवैधानिक/विधिक अधिकार है। कथन 2 और 3 सही हैं: विनीता शर्मा (2020) मामले में स्पष्ट किया गया कि बेटियों को सहदायिकी अधिकार जन्म से प्राप्त होता है और 9 सितंबर 2005 को पिता का जीवित होना अनिवार्य नहीं है; एयर इंडिया (1996) में अनुच्छेद 38, 39 और 46 के तहत वितरक न्याय को संवैधानिक आधारशिला माना गया।
🏛️ UPSC प्रमाणिक पूर्ववर्ती प्रश्न (Prelims 2021)प्रश्न हल करने का प्रयास करें
प्रश्न: भारत के संविधान के तहत, धन का संकेंद्रण किसका उल्लंघन करता है?
A) समता का अधिकार
B) राज्य की नीति के निदेशक तत्व
C) स्वतंत्रता का अधिकार
D) कल्याण की अवधारणा
A) समता का अधिकार
B) राज्य की नीति के निदेशक तत्व
C) स्वतंत्रता का अधिकार
D) कल्याण की अवधारणा
सही उत्तर: B (राज्य की नीति के निदेशक तत्व) व्याख्या: भारतीय संविधान के भाग IV (राज्य की नीति के निदेशक तत्व) में स्थित अनुच्छेद 39(c) स्पष्ट रूप से राज्य को निर्देश देता है कि "आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो।"
📝 मुख्य परीक्षा (Mains) उत्तर लेखन रूपरेखा (GS पेपर I & II)
प्रश्न: "महिला कल्याण से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर अग्रसर होने के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण को प्रतिपूरक राहत से वितरक न्याय की ओर स्थानांतरित करना आवश्यक है।" भारत में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों और आर्थिक सशक्तिकरण के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
1. प्रस्तावना: प्रतिपूरक न्याय (उपचारात्मक सब्सिडी, आरक्षण) और वितरक न्याय (अनुच्छेद 38 व 39 के तहत संपत्ति पुनर्गठन) के बीच अंतर स्पष्ट करें; NCW के 2026 के राष्ट्रीय परामर्श का संदर्भ दें।
2. मुख्य भाग के तर्क:
• प्रतिपूरक कल्याण की सीमाएं: कल्याणकारी योजनाएं महिलाओं को केवल निष्क्रिय आश्रित मानती हैं; इनसे पारिवारिक निर्णय लेने की शक्ति या पितृसत्तात्मक ढांचे में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आता।
• अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach): स्वतंत्र भूमि और सहदायिकी अधिकार महिलाओं की संस्थागत ऋण पात्रता, कृषि उत्पादकता और सामाजिक स्थिति को सशक्त बनाते हैं।
• न्यायिक संवाहक: *विनीता शर्मा (2020)* निर्णय (हिंदू उत्तराधिकार संशोधन 2005 के तहत जन्मसिद्ध सहदायिकी अधिकार) और *CERC (1995)* (अनुच्छेद 21 के साथ वितरक न्याय का संबंध) का उल्लेख करें।
• क्रियान्वयन की जमीनी बाधाएं: सामाजिक प्रतिरोध, विधिक साक्षरता की कमी, अनौपचारिक हक-त्याग (Haq-Tyag) दस्तावेज और जटिल दाखिल-खारिज प्रक्रियाएं।
• रणनीतिक सुधार: स्वचालित डिजिटल उत्तराधिकार नामांतरण, सरकारी आवास योजनाओं में अनिवार्य महिला स्वामित्व, तथा SHG-NALSA कानूनी जागरूकता।
3. निष्कर्ष: 'विकसित भारत@2047' के निर्माण हेतु महिलाओं को केवल कल्याणकारी प्राप्तकर्ता नहीं बल्कि संप्रभु संपत्ति स्वामी और आर्थिक निर्णयकर्ता बनाना अपरिहार्य है।
GS पेपर IIIवन्यजीव संरक्षण व पारिस्थितिकीसंरक्षित क्षेत्र प्रबंधन (30x30 लक्ष्य)वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
क्या सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप के बिना भारत में वन्यजीव फल-फूल सकते हैं? किला संरक्षण की सीमाएं, प्रमुख प्रजाति पूर्वाग्रह और दंडात्मक अनुसंधान कानून
Prelims: WPA 1972 अनुसंधान बाधाएं, 5% संरक्षित क्षेत्र कमी, GIB झाड़ीदार पारिस्थितिकीMains: किला संरक्षण बनाम सामुदायिक सह-अस्तित्व, प्रमुख मेगाफौना पूर्वाग्रह विकृतियांState PSCs: प्रोजेक्ट टाइगर बनाम घास के मैदानों का पारिस्थितिक प्रबंधन
संरक्षित क्षेत्र विस्तार
~5% भूमि क्षेत्र (औसत आकार: 200 वर्ग किमी)
वार्षिक संरक्षण व्यय
₹3,500 करोड़ (आवश्यकता ₹10,000 करोड़)
विधिक विनियामक बाधा
WPA 1972 अनुसंधान को शिकार के समान मानता है
1 संपादकीय विमर्श: मानव-बहुल परिदृश्यों में वन्यजीव संरक्षण पर पुनर्विचार
वरिष्ठ वन्यजीव जीववैज्ञानिकों डॉ. कमर कुरैशी (WII) और डॉ. उमा रामकृष्णन (NCBS बेंगलुरु) के बीच जैकब कोशी द्वारा संचालित आधिकारिक संवाद The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026 में प्रकाशित हुआ है। बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघिन को छोड़े जाने और कूनो में चीता पुनर्वास जैसी निरंतर घटनाओं की पृष्ठभूमि में यह संवाद एक बुनियादी प्रश्न उठाता है: क्या भारत में वन्यजीव बिना सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप के जीवित रह सकते हैं?
दोनों विशेषज्ञों ने इस औपनिवेशिक मिथक को खारिज किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल अमीर पश्चिमी देशों का विशेषाधिकार है; सीमित संसाधनों के बावजूद भारत, कोस्टा रिका, ब्राजील और रवांडा जैसे देशों ने संरक्षण को प्राथमिकता दी है। हालांकि, भारत का मौजूदा संरक्षण ढांचा गंभीर संरचनात्मक विरोधाभासों से ग्रस्त है: बाड़युक्त किला संरक्षण (Fortress Conservation) और प्रमुख मेगाफौना (बाघ) पर अत्यधिक ध्यान वनेतर बायोम (घास के मैदान, झाड़ीदार भूमि) की उपेक्षा करता है; संरक्षित क्षेत्र (PAs) देश के केवल 5% क्षेत्र को कवर करते हैं; और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 अकादमिक नमूना संग्रह को भी अवैध शिकार के समान नौकरशाही बाधाओं में बांधकर वैज्ञानिक अनुसंधान को पंगु बना देता है।
2 तुलनात्मक विश्लेषण: प्रमुख प्रजाति मॉडल बनाम समग्र पारिस्थितिक विज्ञान
संरक्षण का आयाम
पारंपरिक प्रमुख प्रजाति / बाड़बंदी मॉडल
जमीनी पारिस्थितिक परिदृश्य की वास्तविकता
संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता
प्रजाति प्राथमिकता
बाघ और बड़े मांसाहारी राजनीतिक ध्यान, विशाल धनराशि और 4 लाख वर्ग किमी सर्वेक्षण नेटवर्क प्राप्त करते हैं
शीर्ष शिकारियों का संरक्षण स्वतः घास के मैदानों की रक्षा नहीं करता; भेड़िए, कैराकल और बस्टर्ड विशिष्ट शुष्क पारिस्थितिकी पर निर्भर हैं
बाघों से आगे बढ़कर अत्यधिक संकटग्रस्त घास के मैदानों, झाड़ीदार भूमि और नदी पारिस्थितिकी तंत्रों को प्राथमिकता देना
बाड़बंदी दृष्टिकोण
मानवीय उपस्थिति को बाहर करने के लिए संरक्षित क्षेत्रों की बाड़बंदी (उदा. गुजरात और आंध्र में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अभयारण्य)
बाड़ लगाने से पारंपरिक पशुचारण रुका; काले हिरण अनियंत्रित रूप से बढ़े और फसलें नष्ट कीं, जिससे स्थानीय लोग संरक्षण के विरोधी बन गए
बाड़-मुक्त, बहु-उपयोगी परिदृश्य मॉडल अपनाना जो पारंपरिक चराई और स्थानीय समुदायों के संरक्षण अधिकारों को समाहित करे
प्राकृतिक बाधा चक्र
जानवरों की मृत्यु रोकने के लिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं का कृत्रिम दमन (जैसे बाढ़ नियंत्रण के उपाय)
तराई पारिस्थितिकी तंत्र (काजीरंगा, दुधवा) घास के मैदानों के क्रमिक विकास और पोषक चक्र के लिए वार्षिक बाढ़ स्पंदनों (flood pulses) पर निर्भर हैं
कृत्रिम स्थिरता बनाने के बजाय पारिस्थितिक जटिलताओं और प्राकृतिक बाढ़/अग्नि चक्रों को संरक्षण रणनीति का हिस्सा बनाना
वैज्ञानिक अनुसंधान विनियमन
WPA 1972 एक कठोर दंडात्मक कानून है; जैविक नमूना संग्रह पर अत्यधिक कठिन अनुमति प्रक्रियाएं लागू हैं
पारिस्थितिक अनुसंधान नौकरशाही की लालफीताशाही में फंस जाता है; स्वतंत्र शोधकर्ता और विश्वविद्यालय अध्ययन से वंचित हो जाते हैं
WPA 1972 में संशोधन कर गैर-आक्रामक अनुसंधान और नमूना संग्रह को शिकार की दंडात्मक परिभाषा से मुक्त करना
3 भारत के पर्यावरण शासन ढांचे का आधुनिकीकरण
कदम 01
5% सीमाओं से आगे गलियारे
वनवासियों को विस्थापित किए बिना, कृषि-पशुचारण क्षेत्रों में वन्यजीव गलियारों का विस्तार कर कुनमिंग-मॉन्ट्रियल 30x30 लक्ष्यों की ओर बढ़ना।
कदम 02
अनुसंधान को अपराध-मुक्त करना
वन्यजीव संरक्षण कानून में सुधार कर कीटों, पादपों और आनुवंशिक अध्ययनों हेतु पारदर्शी डिजिटल सिंगल-विंडो अनुसंधान मंजूरी तंत्र बनाना।
कदम 03
संरक्षण वित्तपोषण घाटा पाटना
राष्ट्रीय संरक्षण बजट को ₹3,500 करोड़ से बढ़ाकर ₹10,000 करोड़ करना और वनेतर घास के मैदानों, आर्द्रभूमियों व हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशिष्ट निधि तय करना।
🎯 Prelims अभ्यास प्रश्नपारिस्थितिकी, जैव विविधता एवं वन्यजीव संरक्षण
प्रश्न: भारत में वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिक शासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में संरक्षित क्षेत्र (राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य) देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 15% से अधिक हिस्से को कवर करते हैं, जिससे कुनमिंग-मॉन्ट्रियल जैव विविधता लक्ष्य पूर्ण हो चुके हैं।
2. तराई संरक्षण परिदृश्यों (जैसे काजीरंगा और दुधवा) में घास के मैदानों का पारिस्थितिक अनुक्रमण (succession) अनिवार्य रूप से आवधिक मौसमी बाढ़ स्पंदनों (flood pulses) पर निर्भर करता है।
3. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में ऐसे विशिष्ट प्रावधान हैं जो गैर-आक्रामक वैज्ञानिक अनुसंधान और जैविक नमूना संग्रह को 'शिकार' (hunting) की परिभाषा से पूरी तरह छूट देते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 2 और 3
D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: B (केवल 2) व्याख्या: कथन 2 सही है: तराई पारिस्थितिकी तंत्र में उपजाऊ गाद जमा करने और वृक्षों द्वारा घास के मैदानों पर अतिक्रमण रोकने के लिए मौसमी बाढ़ आवश्यक है। कथन 1 गलत है: भारत का संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क देश के केवल लगभग 5% भूभाग को कवर करता है, जो 30% वैश्विक लक्ष्य से काफी कम है। कथन 3 गलत है: वन्यजीव वैज्ञानिकों के अनुसार, WPA 1972 एक दंडात्मक कानून है जो अनुसंधान हेतु नमूना संग्रह को भी शिकार के समान जटिल कानूनी प्रक्रियाओं में बांधता है।
🏛️ UPSC प्रमाणिक पूर्ववर्ती प्रश्न (Prelims 2020)प्रश्न हल करने का प्रयास करें
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-सा संरक्षित क्षेत्र भारतीय दलदली हिरण (बारहसिंगा) की उस उप-प्रजाति के संरक्षण के लिए जाना जाता है, जो कठोर भूमि पर पनपती है और अनन्य रूप से घासभक्षी (graminivorous) है?
A) कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
B) मानस राष्ट्रीय उद्यान
C) मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य
D) ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य
A) कान्हा राष्ट्रीय उद्यान
B) मानस राष्ट्रीय उद्यान
C) मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य
D) ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य
सही उत्तर: A (कान्हा राष्ट्रीय उद्यान) व्याख्या: कठोर भूमि पर रहने वाले बारहसिंगा (Rucervus duvaucelii branderi), जो पूर्णतः घासभक्षी उप-प्रजाति है, को मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में समर्पित घास के मैदान प्रबंधन और सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप द्वारा विलुप्ति के कगार से सफलतापूर्वक बचाया गया।
📝 मुख्य परीक्षा (Mains) उत्तर लेखन रूपरेखा (GS पेपर III)
प्रश्न: "किला संरक्षण और प्रमुख मेगाफौना प्रजातियों पर अत्यधिक निर्भरता खंडित परिदृश्यों की पारिस्थितिक जटिलताओं को संबोधित करने में विफल रहती है।" भारत की वन्यजीव प्रबंधन रणनीति का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा विज्ञान एवं समुदाय-आधारित संरक्षण सुधारों का सुझाव दीजिए। (250 शब्द)
1. प्रस्तावना: औपनिवेशिक बाड़बंदी मॉडल की तुलना भारत के मानव-बहुल परिदृश्य से करें; उल्लेख करें कि भारत में संरक्षित क्षेत्र केवल ~5% हैं।
2. मुख्य भाग के तर्क:
• प्रमुख प्रजाति पूर्वाग्रह: प्रोजेक्ट टाइगर ने 4 लाख वर्ग किमी में भारी सफलता पाई, किंतु वनेतर पारिस्थितिकी तंत्र (घास के मैदान, झाड़ीदार भूमि) उपेक्षित रहे जहां भेड़िए, कैराकल और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संकट में हैं।
• बाड़बंदी संरक्षण के नुकसान: बस्टर्ड अभयारण्यों में बाड़ लगाने से पारंपरिक पशुचारण बंद हुआ; काले हिरणों की अनियंत्रित वृद्धि ने फसलें नष्ट कीं, जिससे स्थानीय समुदाय नाराज हुए।
• अनुसंधान पर कानूनी ताले: WPA 1972 का दंडात्मक दृष्टिकोण वैज्ञानिकों द्वारा बुनियादी कीट एवं पादप नमूना संग्रह को भी अवैध शिकार के समान मानता है, जिससे अनुसंधान बाधित होता है।
• वित्तपोषण असंतुलन: ₹10,000 करोड़ की आवश्यकता के मुकाबले केवल ₹3,500 करोड़ का आवंटन, जो मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा टाइगर रिजर्व में केंद्रित है।
• संस्थागत सुधार: सामुदायिक संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार, पशुपालकों के साथ सह-प्रबंधन, प्राकृतिक बाढ़ चक्रों की स्वीकृति और वैज्ञानिक अनुसंधान को अपराध-मुक्त करना।
3. निष्कर्ष: संरक्षण नीति को बाड़युक्त अलगाव से हटाकर विज्ञान-सम्मत, समुदाय-संचालित और परिदृश्य-स्तरीय पारिस्थितिक शासन में बदलना होगा।
GS पेपर II & IIIविश्व खाद्य दिवस 2026खाद्य व पोषण सुरक्षा (NFSA 2013)ग्लोबल साउथ सहयोग (FAO, IFAD, WFP)
'आज नवाचार करें, कल पोषण दें': विश्व खाद्य दिवस 2026, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां और ग्लोबल साउथ के लिए भारत का ब्लूप्रिंट
Prelims: NFSA 2013 कवरेज, PMGKAY 2028 विस्तार, ONORC पोर्टेबिलिटी, ग्रेन एटीएमMains: कैलोरी सुरक्षा से पोषण सुरक्षा, अंतिम छोर तक एग्रीटेक, ग्लोबल साउथ नेतृत्वState PSCs: PDS डिजिटलीकरण व मोटे अनाज (श्री अन्न) का एकीकरण
NFSA कानूनी कवरेज
~81 करोड़ लोग (75% ग्रामीण, 50% शहरी)
IFAD निवेश अनुपात
$1 निवेश से >$3 अतिरिक्त पूंजी सृजन
निजी भागीदारी लाभ
छोटे किसानों की आय में 64% वृद्धि
1 संपादकीय विमर्श: खाद्य संकट से तकनीक-संचालित पोषण संप्रभुता तक
16 अक्टूबर को "आज नवाचार करें, कल पोषण दें" (Innovate today, nourish tomorrow) विषय के साथ मनाए गए विश्व खाद्य दिवस 2026 के अवसर पर, रोम स्थित तीन संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसियों के भारतीय प्रमुखों—कोंडा रेड्डी चव्वा (FAO), जेम्स मार्क डी सूसा-शील्ड्स (IFAD) और एलिजाबेथ फॉरे (WFP)—ने The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026 में भारत के कृषि-खाद्य परिवर्तन का संयुक्त विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वैश्विक स्तर पर आज भी 64.5 करोड़ लोग भुखमरी झेल रहे हैं और जलवायु झटकों, मुद्रास्फीति व संघर्षों के कारण एक-तिहाई आबादी स्वस्थ आहार से वंचित है।
इस संकटपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में, भारत का ऐतिहासिक सफर दुनिया के लिए एक सशक्त मॉडल है। 1960 के दशक के 'शिप-टू-माउथ' संकट से उबरकर खाद्यान्न, दूध, दाल और सब्जियों के शीर्ष उत्पादक के रूप में उभरते हुए भारत ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के तहत दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा जाल निर्मित किया। लगभग 81 करोड़ नागरिकों को कवर करने वाली यह व्यवस्था प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 2028 तक निःशुल्क खाद्यान्न गारंटी से सुदृढ़ की गई है तथा इसे डिजिटल राशन कार्ड, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' (ONORC) के माध्यम से पारदर्शी बनाया गया है।
2 संस्थागत ढांचा: संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां और भारत का कृषि नवाचार तंत्र
एजेंसी / रूपरेखा
रणनीतिक फोकस क्षेत्र
प्रमुख तकनीकी / वित्तीय नवाचार
विकासात्मक प्रभाव व विस्तार क्षमता
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)
खेत उत्पादकता, पशुधन स्वच्छता और कटाई-पश्चात नुकसान में कमी
डिजिटल कृषि विस्तार रोडमैप; डेयरी किसानों के लिए 'क्लीन मिल्क स्कोरकार्ड'; अपशिष्ट मूल्यवर्धन (बायोएनर्जी व कंपोस्टिंग)
अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को वास्तविक समय में सलाह देकर उत्सर्जन घटाता है और खाद्य बर्बादी रोकता है
कृषि विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय कोष (IFAD)
अंतिम-मील वित्तीय पोषण, छोटे किसानों की मूल्य श्रृंखला व निजी पूंजी को आकर्षित करना
ऋण और बाजार पहुंच को जोड़ने वाला "फाइनेंसिंग प्लस" मॉडल; एशिया-प्रशांत में निजी क्षेत्र की साझेदारियों को प्रत्यक्ष ऋण
प्रत्येक $1 के निवेश पर >$3 की निजी/घरेलू पूंजी आकर्षित होती है; निजी जुड़ाव वाली परियोजनाओं में छोटे किसानों की आय 64% बढ़ती है
विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP - नोबेल शांति 2020)
सार्वजनिक वितरण दक्षता, आपूर्ति-श्रृंखला अनुकूलन और पोषण संवर्धन
स्वचालित ग्रेन एटीएम ('अन्नपूर्ति'); IIT दिल्ली पब्लिक सर्विसेज लैब द्वारा रसद अनुकूलन; आहार विविधता सूचकांक
राशन वितरण में लीकेज को पूरी तरह समाप्त करता है; मातृत्व एवं बाल पोषण योजनाओं में जलवायु-अनुकूल मोटे अनाज (श्री अन्न) को जोड़ता है
ग्लोबल साउथ के लिए भारत का ब्लूप्रिंट
विकासशील देशों में मापनीय खाद्य सुरक्षा प्रणालियों का निर्यात
खंडित भूमि जोत, मानसूनी विविधता और विशाल आबादी के अनुकूल किफायती प्रौद्योगिकियों व बायोफोर्टिफाइड फसलों का प्रसार
अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशियाई देशों को जलवायु आपदाओं से निपटने हेतु स्वतंत्र संस्थागत उपकरण प्रदान करता है
3 अगली पीढ़ी का रोडमैप: कैलोरी सुरक्षा से पोषण प्रणालियों की ओर
स्तंभ 01
मोटे अनाज का मुख्यधारा में समावेश
अदृश्य भूख और बौनेपन से निपटने हेतु पीएम-पोषण और आंगनवाड़ी सेवाओं में बायोफोर्टिफाइड फसलों व मोटे अनाज (श्री अन्न) के वितरण का विस्तार करना।
स्तंभ 02
ग्रेन एटीएम नेटवर्क का विस्तार
प्रवासी मजदूरों की घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में 24/7 पारदर्शी अनाज उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु WFP के 'अन्नपूर्ति' ग्रेन एटीएम स्थापित करना।
स्तंभ 03
निजी कृषि-तकनीक पूंजी निवेश
IFAD के मिश्रित वित्तीय मॉडल का उपयोग कर एग्री-टेक स्टार्टअप्स को कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) से जोड़ना।
🎯 Prelims अभ्यास प्रश्नकृषि, पोषण एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाएं
प्रश्न: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 और भारत में खाद्य सुरक्षा पहलों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. NFSA, 2013 के तहत रियायती खाद्यान्न की कानूनी पात्रता ग्रामीण आबादी के 75% तक और शहरी आबादी के 50% तक को कवर करती है।
2. 'वन नेशन वन राशन कार्ड' (ONORC) योजना प्रवासी लाभार्थियों को बायोमेट्रिक आधार सत्यापन के माध्यम से देश भर की किसी भी उचित मूल्य की दुकान से खाद्यान्न प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।
3. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY), जो NFSA लाभार्थियों को मुफ्त खाद्यान्न प्रदान करती है, को 2024 के अंत में स्थायी रूप से बंद कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: A (केवल 1 और 2) व्याख्या: कथन 1 और 2 सही हैं: NFSA 2013 की धारा 3(2) ग्रामीण क्षेत्र में 75% और शहरी क्षेत्र में 50% आबादी को कवरेज प्रदान करती है; ONORC राष्ट्रीय बायोमेट्रिक पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करता है। कथन 3 गलत है: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने PMGKAY के तहत मुफ्त खाद्यान्न वितरण को 5 वर्षों के लिए यानी 2028 तक बढ़ा दिया है।
🏛️ UPSC प्रमाणिक पूर्ववर्ती प्रश्न (Prelims 2018)प्रश्न हल करने का प्रयास करें
प्रश्न: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत किए गए प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केवल 'गरीबी रेखा से नीचे (BPL)' श्रेणी में आने वाले परिवार ही रियायती खाद्यान्न प्राप्त करने के पात्र हैं।
2. परिवार में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की सबसे वरिष्ठ महिला राशन कार्ड जारी किए जाने के उद्देश्य से परिवार की मुखिया होगी।
3. गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं गर्भावस्था के दौरान और उसके बाद छह महीने तक प्रति दिन 1600 कैलोरी का 'टेक-होम राशन' पाने की हकदार हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 1 और 3
D) केवल 3
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 1 और 3
D) केवल 3
सही उत्तर: B (केवल 2) व्याख्या: NFSA 2013 की धारा 13(1) के अनुसार, राशन कार्ड जारी करने के लिए 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की सबसे वरिष्ठ महिला परिवार की मुखिया मानी जाती है (कथन 2 सही है)। कथन 1 गलत है: इस कानून ने पुराने BPL/APL वर्गीकरण को समाप्त कर प्राथमिकता वाले परिवारों और अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत कुल आबादी के 67% को शामिल किया। कथन 3 गलत है: गर्भवती महिलाओं को प्रति दिन कम से कम 600 कैलोरी (और 18-20 ग्राम प्रोटीन) युक्त भोजन का अधिकार है, 1600 कैलोरी का नहीं।
📝 मुख्य परीक्षा (Mains) उत्तर लेखन रूपरेखा (GS पेपर II & III)
प्रश्न: "भारत का खाद्य सुरक्षा ढांचा कैलोरी पर्याप्तता से पोषण सुदृढ़ता की ओर सफलतापूर्वक स्थानांतरित हुआ है, जो ग्लोबल साउथ के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करता है।" SDG 2 (शून्य भुखमरी) की प्राप्ति में संस्थागत नवाचारों, सार्वजनिक वितरण सुधारों और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
1. प्रस्तावना: विश्व खाद्य दिवस 2026 के विषय ("आज नवाचार करें, कल पोषण दें") का उल्लेख करें; भारत द्वारा NFSA के तहत 81 करोड़ लोगों को कवर करने वाले विश्व के सबसे बड़े सुरक्षा तंत्र के निर्माण को रेखांकित करें।
2. मुख्य भाग के तर्क:
• PDS का तकनीकी आधुनिकीकरण: बायोमेट्रिक आधार लिंकेज, लीकेज की रोकथाम, और प्रवासी श्रमिकों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली ONORC राष्ट्रीय पोर्टेबिलिटी।
• प्रथम-मील तकनीक व UN भूमिका: FAO की डिजिटल डेयरी सलाह, IFAD का 1:3 मिश्रित वित्तीय मॉडल (किसानों की आय में 64% वृद्धि), और WFP के 'अन्नपूर्ति' ग्रेन एटीएम।
• पोषण सुरक्षा की ओर बदलाव: केवल गेहूं-चावल पर निर्भरता घटाकर मोटे अनाज (श्री अन्न) और बायोफोर्टिफाइड फसलों को पोषण योजनाओं में शामिल करना।
• ग्लोबल साउथ के लिए आदर्श: कम लागत वाली कृषि तकनीक, छोटे किसानों का FPO के माध्यम से एकत्रीकरण और जलवायु-सहिष्णु मोटे अनाज के मॉडल को विकासशील देशों में लागू करना।
3. निष्कर्ष: भुखमरी मुक्त विश्व की रचना हेतु महिला-संचालित, छोटे किसानों पर केंद्रित डिजिटल कृषि नवाचारों को वैश्विक स्तर पर संस्थागत बनाना आवश्यक है।
The Hindu Editorial Today Hindi 16 October 2026: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रतिपूरक न्याय कल्याणकारी भत्ते, आरक्षण और उत्पीड़न से तात्कालिक सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि वितरक न्याय (अनुच्छेद 38 व 39) महिलाओं को पैतृक व वास्तविक संपत्ति का स्वतंत्र अधिकार देकर आर्थिक ढांचे को पुनर्गठित करता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन के तहत बेटी जन्म से ही सहदायिक (Coparcener) है, भले ही 9 सितंबर 2005 को पिता जीवित रहे हों या नहीं।
बाघ मुख्य रूप से वनों में रहने वाला शीर्ष शिकारी है; इस मॉडल को शुष्क घास के मैदानों या झाड़ियों पर लागू करने से भेड़िए, कैराकल और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों की उपेक्षा हुई है।
यह अधिनियम मूलतः एक दंडात्मक कानून है, जो गैर-आक्रामक अकादमिक अनुसंधान हेतु जैविक नमूना संग्रह को भी अवैध शिकार के समान कठोर नौकरशाही अनुमति प्रक्रियाओं के अधीन रखता है।
81 करोड़ लाभार्थियों का शत-प्रतिशत डिजिटलीकरण, बायोमेट्रिक आधार प्रमाणीकरण, 'वन नेशन वन राशन कार्ड' पोर्टेबिलिटी, स्वचालित ग्रेन एटीएम (अन्नपूर्ति) और मोटे अनाज (श्री अन्न) के समावेश से यह संभव हुआ।
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प्रत्यक्ष अभ्यास मंच: तीनों संपादकीय अनुभागों में सीधे हल करने योग्य Prelims अभ्यास प्रश्न तथा पूर्ववर्ती वर्ष के UPSC अசல் प्रश्न (PYQs) व्याख्या बटन के साथ शामिल हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs): मुख्य परीक्षा एवं वॉयस सर्च हेतु उपयुक्त 5 संक्षिप्त व ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तर।