🏮 चीन के हुक्को सिस्टम में ‘समाप्ति के बिना समावेशन’
लेखक: आनंद पी. कृष्णन | संदर्भ: 22 मई 2025 को चीन की स्टेट काउंसिल ने ‘हुक्को की परवाह किए बिना, निवास स्थान पर बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं’ को बढ़ावा देने के दिशानिर्देश जारी किए।
📋 पाठ्यक्रम:GS-2: अन्य देशों की नीतियों का प्रभावGS-1: शहरीकरण, प्रवासन
🎯 चर्चा में क्यों? चीन ने मेगा-सिटीज में प्रवासियों को शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य बीमा देने के निर्देश दिए हैं, लेकिन हुक्को (hukou) प्रणाली को समाप्त नहीं किया — केवल ‘स्थायी निवासी जनसंख्या’ (changzhu renkou) की अवधारणा से समावेशन बढ़ाया जा रहा है।
⚡ मुख्य तर्क
चीन हुक्को को खत्म किए बिना प्रवासियों को सार्वजनिक सेवाओं में शामिल कर रहा है। कारण आर्थिक हैं — घरेलू खपत बढ़ाना, एकीकृत राष्ट्रीय बाजार बनाना, ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ से ‘प्रतिभा लाभांश’ की ओर जाना, और 20 करोड़ से अधिक गिग वर्कर्स को नियंत्रित करना। लेकिन वित्त पोषण स्थानीय सरकारों पर है, सामाजिक बीमा मानक अलग-अलग हैं, और संरचनात्मक नियंत्रण बना हुआ है — इसलिए यह ‘सुधार’ है, ‘क्रांति’ नहीं।
📜 हुक्को क्या है?
1950 के दशक में शुरू — माओ युग में आंतरिक प्रवासन को सीमित करने और संसाधन आवंटन के लिए।
आंतरिक पासपोर्ट की तरह — ग्रामीण/शहरी में विभाजन; शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन जैसी सेवाएं पंजीकरण स्थान से जुड़ीं।
1978 के बाद श्रम गतिशीलता खुली, पर हुक्को बना रहा।
🔄 2014 से सुधार और 2025 के निर्देश
2014 के बाद
छोटे शहरों में ग्रामीण हुक्को को शहरी में बदला गया।
मेगा-सिटी बाहर रहीं।
‘स्थायी निवासी’ और ‘वास्तविक निवास स्थान’ शब्दों से हुक्को को बदलने की कोशिश।
22 मई 2025 गाइडलाइंस
निवास स्थान पर ही सामाजिक बीमा, शिक्षा, सार्वजनिक किराया आवास देने का निर्देश।
लक्ष्य: शहरी स्थायी निवासियों को 2023 के 66.16% (93.26 करोड़) से 2029 तक 70% (98.7 करोड़) करना।
‘फ्लोटिंग पॉपुलेशन’ (liudong renkou) — 2025 के अंत में 35.8 करोड़ (25% जनसंख्या)।
💡 सुधार के पीछे 3 कारण
1. ‘लोगों में निवेश’: 15वीं पंचवर्षीय योजना में — मानव संसाधन को मानव पूंजी बनाना, जनसांख्यिकीय लाभांश से प्रतिभा लाभांश।
2. घरेलू खपत: प्रवासियों को शहर में बसाने से खर्च बढ़ेगा, एकीकृत बाजार बनेगा।
3. गिग इकॉनमी: 74 करोड़ कुल कार्यबल में 20 करोड़ से अधिक गिग/प्लेटफॉर्म वर्कर — इनका राजनीतिक समावेशन और श्रम संरक्षण जरूरी।
⚠️ बनी हुई संरचनात्मक समस्याएं
शब्द ‘हुक्को’ का उल्लेख केवल एक बार — प्रणाली बनी हुई है।
वित्तीय बोझ: स्थानीय सरकारें सेवाएं देंगी, पर फंड केंद्र से आएगा; रियल एस्टेट संकट से शहरों का बजट अस्थिर।
बीमा में असमानता: तटीय शहरों में योगदान अधिक, पर प्रवासी को अपने गरीब गृह प्रांत के हिसाब से कम लाभ मिलता है।
नियोक्ता पर बाध्यता नहीं: गिग कंपनियों को वर्कर्स को अनिवार्य रूप से बीमा में डालने का निर्देश नहीं।
🇮🇳 भारत के लिए सीख
भारत में भी अंतर-राज्य प्रवासी (लगभग 10 करोड़) हैं। चीन का मॉडल बताता है कि ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’, ई-श्रम पोर्टल जैसे पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा के बिना शहरीकरण अधूरा है। पर वित्त-पोषण का विकेंद्रीकरण और कानूनी बाध्यता जरूरी है।
🔑 प्रमुख शब्द
Hukou (हुक्को)Liudong Renkou (फ्लोटिंग पॉपुलेशन)Changzhu RenkouInvesting in PeopleTalent Dividend
🎯 अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक Q1
चीन के हुक्को सुधार के संदर्भ में विचार करें: 1. हुक्को 1950 के दशक में आंतरिक प्रवासन नियंत्रित करने के लिए शुरू हुआ। 2. 22 मई 2025 के दिशानिर्देश मेगा-सिटी में हुक्को को पूरी तरह समाप्त करते हैं। 3. चीन की फ्लोटिंग पॉपुलेशन 2025 में लगभग 35.8 करोड़ है।
📖 उत्तर
कथन 2 गलत है — दिशानिर्देश समावेशन को बढ़ावा देते हैं, हुक्को को समाप्त नहीं करते। लेख स्पष्ट करता है कि यह ‘समाप्ति के बिना समावेशन’ है। उत्तर (a)
द हिंदू | भारत-नेपाल संबंध
🤝 भारत-नेपाल संबंधों में एक नया चरण
लेखक: के.वी. राजन, अतुल के. ठाकुर | संदर्भ: नेपाल PM बालेन्द्र शाह ‘बालेन’ ने 31 मई को कहा — सीमा विवाद एकतरफा नहीं, दोनों पक्ष मिलकर हल करें।
📋 पाठ्यक्रम:GS-2: भारत और पड़ोस, द्विपक्षीय संबंध
🎯 चर्चा में क्यों? कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा विवाद पर नेपाल के PM का संतुलित बयान, लिपुलेख से व्यापार पर आपत्ति, और काठमांडू में युवा नेतृत्व का ‘विशेष संबंध’ से ‘समान संबंध’ की ओर झुकाव।
⚡ मुख्य तर्क
नेपाल में राजनीतिक स्वर बदल रहा है — भ्रष्टाचार-मुक्त, भविष्य-उन्मुख युवा शासन भारत को ‘विशेष’ नहीं ‘समान’ मानना चाहता है। PM बालेन का यह कहना कि अतिक्रमण दोनों तरफ से हो सकता है, एक तर्कसंगत शुरुआत है। भारत को अटल बिहारी वाजपेयी जैसी दूरदर्शिता से इस अवसर को पकड़ना चाहिए और सीमा को आर्थिक सहयोग पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
🗺️ सीमा विवाद — क्या हुआ?
विवादित क्षेत्र: कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा — उत्तराखंड में, नेपाल इन्हें अपना बताता है।
PM बालेन का बयान (31 मई): "यह केवल भारत पर आरोप नहीं है, कुछ जगह नेपाल भी भारत की जमीन पर हो सकता है। तथ्यों की वस्तुनिष्ठ जांच करें।"
लिपुलेख पास: नेपाल ने भारत-चीन व्यापार फिर शुरू होने पर आपत्ति जताई; भारत ने नोट का सकारात्मक जवाब दिया — संवाद से हल पर सहमति।
भारत ने नेपाल की आपत्ति को ‘अनुचित’ और ‘एकतरफा कृत्रिम विस्तार’ कहा था।
🔄 बदलता राजनीतिक स्वर
काठमांडू में युवा पीढ़ी — भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद से मुक्ति, सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकता।
प्रोटोकॉल में बदलाव: नेपाल PM ने भारतीय विदेश सचिव को लेने के लिए प्रोटोकॉल तोड़ने से इनकार किया — संकेत: भारत को अन्य देशों के समान माना जाएगा, ‘विशेष संबंध’ नहीं।
नेपाल के पर्यवेक्षक चेतावनी दे रहे हैं — भारत की अनदेखी नेपाल के हित में नहीं।
🛤️ आगे का कूटनीतिक मार्ग
लेखकों के 3 सुझाव
(a) सदियों पुराने संबंध: सांस्कृतिक, धार्मिक, पारिवारिक लिंक।
(b) खुली सीमा: 1,700 किमी से अधिक, 1962 से पहले विवादित क्षेत्र में भी चलती थी।
(c) सेना-सेना विश्वास: भारतीय और नेपाली सेना का मजबूत संस्थागत संबंध — व्यावहारिक समाधान में मददगार।
ब्रिटिश-युग के नक्शे विरोधाभासी हैं — बाद के तकनीकी सर्वेक्षण अलग हैं।
चीन का रुख (शी जिनपिंग): नेपाल-भारत द्विपक्षीय हल करें — यही सबसे तर्कसंगत सलाह।
नेपाल ने विवादित नक्शा अपने नोटों पर छापा है; भारत 1947 की ब्रिटिश विरासत और सुरक्षा हितों पर कायम है।
🇮🇳 भारत के लिए अवसर
अटल बिहारी वाजपेयी के बाद PM मोदी में राजनीतिक आत्मविश्वास है। रबी लामिछाने और विदेश मंत्री शिशिर खनाल की हालिया भारत यात्रा इसी दिशा में है। सीमा को ‘irritant’ बनने से रोकना होगा।
🔑 प्रमुख शब्द
कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुराखुली सीमाविशेष संबंध बनाम समान संबंधStatus Quo
🎯 अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक Q2
भारत-नेपाल सीमा के संदर्भ में: 1. PM बालेन ने कहा विवाद एकतरफा नहीं है। 2. भारत ने लिपुलेख पर नेपाल के दावे को अनुचित बताया। 3. चीन ने कहा है कि UK और चीन को मध्यस्थ बनना चाहिए।
📖 उत्तर
कथन 3 गलत — चीन ने द्विपक्षीय हल की सलाह दी है, मध्यस्थता की नहीं। उत्तर (a)