The Hindu Editorial Today Hindi 12 October 2026 | UPSC
दैनिक UPSC सिविल सेवा संपादकीय विश्लेषण • GS प्रश्नपत्र II व्यापक परीक्षा पुनरीक्षण
GS प्रश्नपत्र II राजव्यवस्था एवं शासन मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 19, 21) आपराधिक न्याय प्रणाली सुधार

UAPA में तत्काल सुधार की आवश्यकता: अस्पष्ट परिभाषाएं, जमानत पर कठोर प्रतिबंध और उचित कानूनी प्रक्रिया का हनन

प्रारंभिक परीक्षा: धारा 43D(5), वटाली निर्णय, अनुच्छेद 21 मुख्य परीक्षा: पूर्व-परीक्षण हिरासत बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता राज्य PSCs: विशेष आतंक-विरोधी कानून
प्रतीकात्मक संदर्भ
प्रो. जी.एन. साईबाबा (द्वितीय पुण्यतिथि)
कठोर वैधानिक प्रावधान
धारा 43D(5) UAPA (जमानत पर प्रतिबंध)
बिना ट्रायल हिरासत काल
आरोप तय किए बिना 6 से 10 वर्ष तक जेल
1 संपादकीय संदर्भ एवं कानूनी पृष्ठभूमि

12 अक्टूबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा की दूसरी पुण्यतिथि है, जिन्होंने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत एक दशक जेल में काटा और 2024 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा पूरी तरह निर्दोष बरी किए जाने के कुछ ही समय बाद जेल जनित बीमारियों के कारण दम तोड़ दिया। यह घटना यह प्रमाणित करती है कि जब तक न्याय मिलता है, तब तक "प्रक्रिया ही अपने आप में एक कठोर सजा" बन जाती है।

संवैधानिक न्यायविद गौतम भाटिया के अनुसार, UAPA का उपयोग राजनीतिक असहमति और नागरिक कार्यकर्ताओं को दबाने के लिए व्यापक रूप से किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव मामला (जिसमें फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मृत्यु हुई और 14 कार्यकर्ताओं को वर्षों बाद जमानत मिली) तथा 2020 दिल्ली दंगा मामला (जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम छह वर्षों से बिना ट्रायल के जेल में बंद हैं) इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं कि कैसे बिना किसी प्रत्यक्ष साक्ष्य के 'बौद्धिक साजिशकर्ता' के आरोप में नागरिकों की स्वतंत्रता छीनी जा रही है।

2 संरचनात्मक विसंगतियां एवं न्यायिक दृष्टिकोण में मुगालता
संवैधानिक संकट वैधानिक धारा / न्यायिक व्याख्या प्रशासनिक प्रभाव नागरिक अधिकारों पर आघात
अस्पष्ट अपराध परिभाषा धाराएं 15, 18, 20 एवं 38 (आतंकवादी कृत्य) वैचारिक साहित्य रखने या नारे लगाने को भी आतंकी साजिश मान लिया जाना विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) पर गंभीर भय का माहौल (Chilling Effect)
'सदस्यता' पर न्यायिक पलटाव अरूप भुइयां (2011) बनाम 2023 SC पुनर्विचार निर्णय 2011 में 'सक्रिय हिंसक सदस्यता' जरूरी थी; 2023 में कोर्ट ने इसे पलटकर निष्क्रिय संपर्क को भी अपराध बना दिया कार्यकारी एजेंसियों को नागरिकों को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करने की असीमित छूट मिल गई
जमानत सिद्धांत का उलटफेर धारा 43D(5) + वटाली निर्णय (2019) जमानत चरण पर पुलिस केस डायरी के साक्ष्यों की सत्यता जांचने से अदालतों को रोकना "जमानत नियम है, जेल अपवाद" का संवैधानिक सिद्धांत पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है
ट्रायल में देरी पर विरोधाभास सर्वोच्च न्यायालय के अलग-अलग बेंचों के भिन्न मानक खुर्रम परवेज मामले में 5 वर्ष की देरी पर जमानत दी गई, लेकिन उमर खालिद मामले में इसे खारिज कर दिया गया समान न्याय के बजाय व्यक्तिगत न्यायाधीशों की धारणाओं पर आधारित न्याय प्रणाली
3 आवश्यक विधायी और न्यायिक सुधार का रोडमैप
सुधार 01
आतंक की सटीक परिभाषा
धारा 15 में केवल वास्तविक हिंसक कृत्यों को ही आतंकी अपराध माना जाए; गैर-हिंसक असहमति व नारों को इससे स्पष्ट बाहर रखा जाए।
सुधार 02
धारा 43D(5) की समयसीमा
यदि राज्य गिरफ्तारी के 18 महीनों के भीतर आरोप तय करने में विफल रहता है, तो आरोपी को वैधानिक अनिवार्य जमानत मिलनी चाहिए।
सुधार 03
वटाली (2019) निर्णय की समीक्षा
संविधान पीठ द्वारा 2019 के निर्णय को पुनर्विचार कर अदालतों को जमानत स्तर पर ही पुलिस साक्ष्यों के खोखलेपन को जांचने का अधिकार मिले।
🎯 प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न UPSC CSE Focus
प्रश्न: गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. धारा 43D(5) के तहत, यदि अदालत का मानना है कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य हैं, तो नियमित जमानत नहीं दी जा सकती।
2. 2019 के संशोधन ने केंद्र सरकार को किसी प्रतिबंधित संगठन से संबद्ध हुए बिना भी व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने की शक्ति दी।
3. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) द्वारा UAPA के तहत प्राथमिकी दर्ज करने से पहले संबंधित राज्य सरकार की अनिवार्य पूर्व अनुमति आवश्यक होती है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
  • A) केवल 1 और 2
  • B) केवल 2 और 3
  • C) केवल 1 और 3
  • D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: A (केवल 1 और 2)
स्पष्टीकरण: कथन 1 सही है (धारा 43D(5) जमानत पर अत्यंत कठोर प्रतिबंध लगाती है)। कथन 2 सही है (2019 संशोधन ने अध्याय VI जोड़कर व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का प्रावधान किया)। कथन 3 गलत है (NIA अधिनियम 2008 के तहत केंद्रीय एजेंसी को बिना राज्य सरकार की पूर्व सहमति के देश भर में अनुसूचित अपराधों की जांच का अधिकार है)।
🏛️ UPSC वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न (Prelims 2021) अभ्यास प्रश्न हल करें
प्रश्न: ऐसा कोई कानून जो प्रशासनिक या कार्यकारी प्राधिकारी को कानून के प्रयोग के मामले में अनियंत्रित और अनिर्देशित विवेकाधिकार प्रदान करता है, भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस अनुच्छेद का उल्लंघन करता है?
A) अनुच्छेद 14
B) अनुच्छेद 28
C) अनुच्छेद 32
D) अनुच्छेद 44
  • A) अनुच्छेद 14
  • B) अनुच्छेद 28
  • C) अनुच्छेद 32
  • D) अनुच्छेद 44
सही उत्तर: A (अनुच्छेद 14)
स्पष्टीकरण: सर्वोच्च न्यायालय ने अनवर अली सरकार वाद सहित कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि कार्यपालिका को असीमित व मनमाना विवेकाधिकार देना अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता व मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण) का सीधा उल्लंघन है। यह UAPA जैसी विशेष संविधियों की अस्पष्ट धाराओं पर भी सटीक लागू होता है।
📝 मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन ढांचा (GS Paper II)
प्रश्न: "अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय तब गंभीर रूप से कमजोर हो जाते हैं जब विशेष आतंकवाद विरोधी कानून सामान्य जमानत न्यायशास्त्र को उलट देते हैं।" UAPA की धारा 43D(5) के संदर्भ में समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
1. भूमिका: "जमानत नियम है और जेल अपवाद" (गुडीकांति नरसिम्हुलु मामला) के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लेख करते हुए धारा 43D(5) की कठोरता को रेखांकित करना।
2. मुख्य भाग: • वटाली (2019) बाधा: बिना साक्ष्य परीक्षण के अभियोजन के आरोपों को स्वीकारना।
• बिना ट्रायल लंबी हिरासत सजा में तब्दील: त्वरित सुनवाई के अधिकार (अनुच्छेद 21 - के.ए. नजीब वाद) का उल्लंघन।
• राजनीतिक असहमति और देशद्रोह के बीच की रेखा का धुंधला होना।
3. निष्कर्ष: आरोप तय करने की निश्चित समयसीमा, न्यायिक परीक्षण की बहाली और राष्ट्रीय सुरक्षा व नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधने की आवश्यकता।
GS प्रश्नपत्र II संवैधानिक निकाय भारत निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) चुनावी सुधार एवं मुफ्त उपहार

भारतीय चुनावों की गरिमा और साख का संरक्षण: संस्थागत विश्वास, 10वीं अनुसूची की खामियां और डिजिटल दुष्प्रचार

प्रारंभिक परीक्षा: अनुच्छेद 324, 2023 EC अधिनियम, आदर्श आचार संहिता मुख्य परीक्षा: निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव राज्य PSCs: चुनावी प्रक्रिया और सुधार
मतदाता आधार (2024–2026)
~98 करोड़ मतदाता (10 लाख+ मतदान केंद्र)
मुफ्त योजनाओं का वित्तीय भार
₹1.7 लाख करोड़ (आर्थिक सर्वेक्षण 2026)
प्रमुख संस्थागत संकट
जनविश्वास का क्षरण व पक्षपात के आरोप
1 संपादकीय संदर्भ एवं संस्थागत पृष्ठभूमि

पूर्व चुनाव आयोग महानिदेशक अक्षय राउत के अनुसार, जिस भारतीय चुनाव प्रणाली को स्वतंत्रता के बाद वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र का आदर्श उदाहरण माना जाता था, वह आज एक गंभीर विश्वास संकट से जूझ रही है। निर्वाचन आयोग कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं के आरोप और मतदाताओं के मनमाने विलोपन की शिकायतें यह दर्शाती हैं कि केवल कुशल लॉजिस्टिक्स से संस्थागत साख नहीं बचाई जा सकती।

भूतकाल के बाहुबल और बूथ कैप्चरिंग को समाप्त करने के बावजूद, वर्तमान चुनाव डीपफेक, एआई-संचालित दुष्प्रचार, मतदाता सूची में तकनीकी हेरफेर और दल-बदल द्वारा जनमत की चोरी का नया तकनीकी कुरुक्षेत्र बन चुके हैं।

2 चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित करने वाले संरचनात्मक खतरे
  • आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका का प्रभुत्व: 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्त नियुक्ति अधिनियम ने चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर प्रधानमंत्री व कैबिनेट मंत्री का बहुमत स्थापित कर दिया, जिससे आयोग की स्वायत्तता पर सवाल उठ रहे हैं।
  • निर्विरोध नकद अंतरण और मुफ्त उपहारों की होड़: आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के अनुसार, राज्यों के खजाने पर ₹1.7 लाख करोड़ का वित्तीय बोझ डालने वाले चुनावी नकद वादे उम्मीदवारों के बीच 'समान अवसर' (Level Playing Field) को नष्ट कर रहे हैं।
  • 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) का खोखलापन: दो-तिहाई विलय की आड़ में सामूहिक दल-बदल और इस्तीफों के जरिए जनादेश का अपहरण किया जा रहा है। मतदाताओं के पास 'रिकॉल' (Right to Recall) का अधिकार न होने से जनमत निरर्थक हो रहा है।
  • डिजिटल दुष्प्रचार और वित्तीय अस्पष्टता: सोशल मीडिया पर अज्ञात विदेशी फंडिंग, लक्षित ध्रुवीकरण और जनरेटिव एआई डीपफेक के सामने निर्वाचन आयोग की पारंपरिक आदर्श आचार संहिता (MCC) असहाय साबित हो रही है।
3 निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता बहाली हेतु ठोस सुझाव
सुधार 01
स्वतंत्र कॉलेजियम नियुक्ति
प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की त्रिपक्षीय समिति द्वारा नियुक्ति हो तथा सभी तीनों आयुक्तों को समान संवैधानिक पद-सुरक्षा मिले।
सुधार 02
घोषणापत्रों का वित्तीय ऑडिट
राजनीतिक दलों को चुनाव पूर्व नकद वादों के लिए स्पष्ट वित्तीय स्रोत और बजटीय प्रभाव निर्वाचन आयोग को अग्रिम रूप से सौंपना अनिवार्य हो।
सुधार 03
दल-बदलुओं पर कठोर प्रतिबंध
दल-बदल करने वाले किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि पर अगले पूरे 5 वर्ष के कार्यकाल तक दोबारा चुनाव लड़ने या मंत्री बनने पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
🎯 प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न संवैधानिक शासन व्यवस्था
प्रश्न: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 324(5) के तहत, किसी अन्य चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता।
2. मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान पदमुक्ति सुरक्षा प्राप्त है।
3. 2023 के अधिनियम के अनुसार, चुनाव आयुक्तों के चयन हेतु गठित समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश अनिवार्य सदस्य हैं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
  • A) केवल 1 और 2
  • B) केवल 2 और 3
  • C) केवल 1 और 3
  • D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: A (केवल 1 और 2)
स्पष्टीकरण: कथन 1 और 2 सही हैं (CEC को महाभियोग जैसी सुरक्षा है तथा ECs को CEC की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है)। कथन 3 गलत है (2023 कानून में चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं; मुख्य न्यायाधीश को इस समिति से बाहर रखा गया है)।
🏛️ UPSC वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न (Prelims 2017) अभ्यास प्रश्न हल करें
प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत निर्वाचन आयोग एक पांच-सदस्यीय निकाय है।
2. केंद्रीय गृह मंत्रालय आम चुनावों और उपचुनावों दोनों के संचालन के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करता है।
3. निर्वाचन आयोग मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के विभाजन/विलय से संबंधित विवादों का निपटारा करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2
C) केवल 2 और 3
D) केवल 3
  • A) केवल 1 और 2
  • B) केवल 2
  • C) केवल 2 और 3
  • D) केवल 3
सही उत्तर: D (केवल 3)
स्पष्टीकरण: निर्वाचन आयोग एक 3-सदस्यीय निकाय है (1 CEC + 2 ECs)। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा स्वतंत्र रूप से निर्वाचन आयोग करता है, गृह मंत्रालय नहीं। चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत दलों के विभाजन और विलय के विवादों को आयोग अर्ध-न्यायिक रूप से सुलझाता है।
📝 मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन ढांचा (GS Paper II)
प्रश्न: "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल प्रशासनिक दक्षता की मांग नहीं करते, बल्कि संस्थागत स्वायत्तता और अटूट जनविश्वास पर टिके होते हैं।" हालिया कानूनी परिवर्तनों और चुनावी प्रवृत्तियों के प्रकाश में निर्वाचन आयोग की चुनौतियों की विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
1. भूमिका: सुकुमार सेन के नेतृत्व में भारतीय चुनावों की ऐतिहासिक सफलता और लोकतंत्र के रक्षक के रूप में अनुच्छेद 324 का उल्लेख।
2. मुख्य भाग: • 2023 आयुक्त नियुक्ति अधिनियम से उपजा निष्पक्षता का संकट।
• मुफ्त योजनाओं का ₹1.7 लाख करोड़ का बोझ और चुनावी समानता का उल्लंघन।
• तकनीकी खतरे: एआई डीपफेक, डिजिटल प्रचार और अपारदर्शी वित्तीय प्रवाह।
• दल-बदल विरोधी कानून का बेअसर होना।
3. निष्कर्ष: सभी चुनाव आयुक्तों को समान संवैधानिक सुरक्षा, निष्पक्ष कॉलेजियम व्यवस्था और आदर्श आचार संहिता को कानूनी शक्ति प्रदान कर संस्थागत साख बहाल करना।
GS प्रश्नपत्र II सुशासन एवं पारदर्शिता RTI अधिनियम, 2005 (धारा 4) केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)

सूचना का अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में अंतराल: स्वैच्छिक गैर-प्रकटीकरण, पारदर्शिता ऑडिट में विफलता और लंबित मामले

प्रारंभिक परीक्षा: धारा 4(1)(b), CIC अधिदेश, DoPT दिशानिर्देश मुख्य परीक्षा: अग्रसक्रिय सुशासन बनाम सूचना असंतुलन राज्य PSCs: सूचना का अधिकार एवं जवाबदेही
ऐतिहासिक मील का पत्थर
21 वर्ष पूरे (2005–2026)
ऑडिट रिपोर्ट अनुपालन
62.7% (2,303 में से 1,446 प्राधिकरण)
वार्षिक याचिकाएं व लंबित मामले
23 लाख संभाले गए (5.1 लाख / 22% लंबित)
1 संपादकीय संदर्भ एवं डेटा विश्लेषण

नागरिकों को सशक्त बनाने वाले सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के 21 वर्ष पूरे होने पर द हिंदू डेटा टीम का अनुभवजन्य अध्ययन यह उजागर करता है कि इस कानून की वास्तविक आत्मा—धारा 4(1)(b)—नौकरशाही की उपेक्षा का शिकार बनी हुई है। धारा 4 सार्वजनिक प्राधिकरणों को अनिवार्य रूप से 16 प्रकार की प्रशासनिक सूचनाएं स्वयं प्रकट (Suo Motu) करने का आदेश देती है ताकि आम जनता को बार-बार RTI आवेदन न करने पड़ें।

केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, पंजीकृत 2,303 सार्वजनिक प्राधिकरणों (PAs) में से केवल 1,446 (62.7%) ने तीसरे पक्ष की पारदर्शिता ऑडिट रिपोर्ट सौंपी। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऑडिट रिपोर्ट देने वाले विभागों में से 50% से अधिक ने ग्रेड C या उससे कम (80% से कम अनुपालन) अंक प्राप्त किए, जबकि 266 विभाग ग्रेड E (<60%) पर विफल रहे। केंद्र सरकार के 94 विभागों के विश्लेषण में केवल 33 विभागों की वेबसाइटों पर ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध थी।

2 डेटा प्वाइंट: सार्वजनिक प्राधिकरण पारदर्शिता ऑडिट ग्रेड वितरण (2024–25)
अनुपालन ग्रेड स्कोर दायरा प्राधिकरणों की संख्या हिस्सेदारी एवं प्रशासनिक विश्लेषण
ग्रेड A 90% – 100% 410 PAs 28.3% (उत्कृष्ट सक्रिय पारदर्शिता)
ग्रेड B 80% – 89% 253 PAs 17.5% (संतोषजनक प्रकटीकरण)
ग्रेड C 70% – 79% 302 PAs 20.9% (अपर्याप्त सूचना स्तर)
ग्रेड D 60% – 69% 215 PAs 14.9% (गंभीर सूचनात्मक कमियां)
ग्रेड E 60% से कम 266 PAs 18.4% (कानून का घोर उल्लंघन)
ऑडिट न देने वाले 0% (रिपोर्ट नहीं दी) 857 PAs कुल पंजीकृत प्राधिकरणों का 37.3% हिस्सा ऑडिट से पूरी तरह नदारद
3 खुली सरकार (Open Government) की स्थापना हेतु ठोस कदम
कदम 01
रीयल-टाइम डिजिटल डैशबोर्ड
स्थैतिक पीडीएफ अपलोड के बजाय सरकारी खरीद, टेंडर और बजट आवंटन के लिए स्वचालित रीयल-टाइम डैशबोर्ड अनिवार्य हों।
कदम 02
अधिकारियों की ACR से जुड़ाव
धारा 4 का अनुपालन न करने पर संबंधित विभाग प्रमुखों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में नकारात्मक प्रविष्टि दर्ज की जाए।
कदम 03
आयोगों में समयबद्ध नियुक्तियां
5.1 लाख लंबित मामलों के बोझ को खत्म करने के लिए सेवानिवृत्त होने वाले सूचना आयुक्तों के स्थान पर 3 महीने पहले ही नियुक्ति हो।
🎯 प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न पारदर्शिता एवं जवाबदेही
प्रश्न: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 4 के तहत निम्नलिखित में से कौन सा सार्वजनिक प्राधिकरणों के लिए स्वतः प्रकटीकरण (Suo Motu Disclosure) का अनिवार्य भाग नहीं है?
A) उसके प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी द्वारा प्राप्त मासिक पारिश्रमिक और क्षतिपूर्ति प्रणाली।
B) योजनाओं और प्रस्तावित व्यय के विवरण को दर्शाने वाला आवंटित बजट।
C) राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कैबिनेट बैठकों के विचार-विमर्श और फाइल नोटिंग्स।
D) सूचना प्राप्त करने के लिए नागरिकों को उपलब्ध सुविधाओं और अधिकारियों की निर्देशिका।
  • A) विकल्प A
  • B) विकल्प B
  • C) विकल्प C
  • D) विकल्प D
सही उत्तर: C (विकल्प C)
स्पष्टीकरण: धारा 4(1)(b) में वेतन, बजट, संपर्क विवरण आदि 16 श्रेणियां शामिल हैं। कैबिनेट विचार-विमर्श और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी फाइलें धारा 8(1)(a) और 8(1)(i) के तहत प्रकटीकरण से स्पष्ट रूप से मुक्त रखी गई हैं।
🏛️ UPSC वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न (Prelims 2019) अभ्यास प्रश्न हल करें
प्रश्न: सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और दस से अनधिक सूचना आयुक्त होंगे।
2. मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर की जाती है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1 और न ही 2
  • A) केवल 1
  • B) केवल 2
  • C) 1 और 2 दोनों
  • D) न तो 1 और न ही 2
सही उत्तर: A (केवल 1)
स्पष्टीकरण: कथन 1 सही है (धारा 12(2) में 1 CIC और अधिकतम 10 ICs का प्रावधान है)। कथन 2 गलत है क्योंकि चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं; भारत के मुख्य न्यायाधीश इसमें शामिल नहीं होते।
📝 मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन ढांचा (GS Paper II)
प्रश्न: "RTI अधिनियम की धारा 4 के तहत अग्रसक्रिय प्रकटीकरण पारदर्शी शासन की धुरी है, फिर भी यह सबसे कम क्रियान्वित होने वाला प्रावधान बना हुआ है।" इस कमी के कारणों का विश्लेषण करते हुए प्रशासनिक सुधार सुझाइए। (250 शब्द)
1. भूमिका: 21 वर्ष पूरे कर चुके RTI कानून के मूल दर्शन "गोपनीयता की संस्कृति को स्वतः पारदर्शिता में बदलना" का उल्लेख करना।
2. मुख्य भाग: • डेटा साक्ष्य: 37.3% प्राधिकरणों द्वारा ऑडिट से बचना और 50%+ का ग्रेड C या उससे नीचे रहना।
• अंतर्निहित कारण: दंडात्मक प्रावधानों का अभाव, पुरानी कागजी संस्कृति, प्रशासनिक उदासीनता और सार्वजनिक निगरानी का डर।
• दुष्चक्र: सूचनाएं स्वतः उपलब्ध न होने से 23 लाख आवेदनों का बोझ और आयोगों में 5.1 लाख लंबित मामले।
3. निष्कर्ष: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) के अनुसार रिकॉर्ड्स का थर्ड पार्टी ऑडिट, एआई डैशबोर्ड और डिफ़ॉल्टर प्राधिकरणों पर जुर्माना लगाकर खुली शासन व्यवस्था स्थापित करना।

The Hindu Editorial Today Hindi 12 October 2026: सामान्य प्रश्नोत्तर (FAQs)

धारा 43D(5) के तहत यदि पुलिस केस डायरी के आधार पर आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है तो अदालत जमानत नहीं दे सकती, जिससे विचाराधीन कैदियों को वर्षों जेल में रहना पड़ता है।
2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर विवाद, ₹1.7 लाख करोड़ के चुनावी मुफ्त उपहार, मतदाता सूची पुनरीक्षण विवाद और डीपफेक दुष्प्रचार प्रमुख चुनौतियां हैं।
यह सरकारी प्राधिकरणों को नागरिकों द्वारा औपचारिक आवेदन किए बिना ही 16 श्रेणियों की महत्वपूर्ण प्रशासनिक सूचनाओं को वेबसाइटों पर स्वतः प्रकट करने का निर्देश देती है।
CIC में पंजीकृत कुल प्राधिकरणों में से केवल 62.7% ने ऑडिट रिपोर्ट दी, और ऑडिट कराने वालों में से 50% से अधिक ने ग्रेड C या उससे कम (80% से कम अनुपालन) स्कोर किया।
आवश्यक सूचनाएं ऑनलाइन उपलब्ध होने से नागरिकों को RTI दायर करने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे आयोगों में लंबित 5.1 लाख मामलों का बोझ सीधे कम होगा।

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