The Hindu Editorial Today in Hindi 7 September 2026
द हिंदू संपादकीय विश्लेषण • 07 सितंबर 2026

The Hindu Editorial Today in Hindi 7 September 2026

📅 दिनांक: 7 सितंबर 2026 🎯 लक्षित परीक्षाएं: UPSC CSE, UPPSC, BPSC, RAS एवं अन्य राज्य लोक सेवा आयोग ⏱️ पठन समय: 12 मिनट
GS Paper 2: भारतीय संविधान, न्यायपालिका, संस्थागत जवाबदेही एवं शासन प्रणाली

1. न्यायिक अखंडता और जवाबदेही: एक ऐसा मामला जिसे शीर्ष अदालत नजरअंदाज नहीं कर सकती

हालिया प्रशासनिक घटनाक्रम और राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के संदर्भ में वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा उठाए गए सवालों ने उच्च न्यायपालिका में संस्थागत पारदर्शिता पर गंभीर विमर्श छेड़ दिया है। यह संपादकीय रेखांकित करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भारत में न्यायिक जवाबदेही और इन-हाउस तंत्र को आधुनिक एवं वैधानिक रूप से सशक्त बनाना क्यों अपरिहार्य हो चुका है।

1. प्रशासनिक पृष्ठभूमि एवं विवाद के मुख्य बिंदु

न्यायमूर्ति संदीप मेहता द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को प्रेषित पत्रों ने उच्च न्यायपालिका के आंतरिक कामकाज में प्रक्रियागत कमियों को उजागर किया है। यह स्पष्ट करता है कि भारत में न्यायिक जवाबदेही और इन-हाउस तंत्र की वर्तमान संरचना केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए नहीं बल्कि नियमित संस्थागत संतुलन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

आंतरिक संचार एवं पारदर्शिता का अभाव

सहयोगी न्यायाधीशों की चिंताओं को प्रशासनिक स्तर पर अनसुलझा छोड़ना संस्थागत विश्वास को कमजोर करता है तथा बाहरी हस्तक्षेप के खतरे को बढ़ाता है।

'मास्टर ऑफ द रोस्टर' का एकाधिकार

मुकदमों के आवंटन और पीठों के गठन में मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधिकार पर पारदर्शी वस्तुनिष्ठ नियमों (Objective Criteria) की कमी लगातार विवाद का कारण बनती रही है।

संवैधानिक मर्यादा एवं साख

जनता का न्यायपालिका में विश्वास इस बात पर निर्भर करता है कि न्यायालय अपने भीतर उठने वाले नैतिक और प्रशासनिक सवालों का समाधान कितनी निष्पक्षता से करता है।

2. 1999 की इन-हाउस प्रक्रिया और विधिक सीमाएं

1999 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण पीठ संकल्प द्वारा अंगीकृत इन-हाउस प्रक्रिया उच्च न्यायिक पदाधिकारियों के आचरण की जांच के लिए बनाई गई थी। हालांकि, भारत में न्यायिक जवाबदेही और इन-हाउस तंत्र के व्यावहारिक विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि इसमें निम्नलिखित गंभीर संरचनात्मक विसंगतियां मौजूद हैं:

  • वैधानिक शक्ति का अभाव: 1999 की इन-हाउस प्रक्रिया एक आंतरिक प्रशासनिक तंत्र है, इसे संसद के किसी अधिनियम या संवैधानिक उपबंध का प्रत्यक्ष विधिक संरक्षण प्राप्त नहीं है।
  • गोपनीयता और प्राकृतिक न्याय: जांच समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाता, न ही शिकायतकर्ता को साक्ष्यों और निष्कर्षों की प्रतिलिपि पाने का अधिकार होता है (जैसा कि इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट मामले में भी देखा गया)।
  • मध्यवर्ती अनुशासनात्मक कार्रवाई का अभाव: या तो न्यायाधीश को पद छोड़ने की सलाह दी जाती है या महाभियोग की सिफारिश की जाती है; मामूली कदाचार या प्रशासनिक अनियमितता के लिए कोई श्रेणीबद्ध दंड प्रक्रिया नहीं है।
  • के. वीरास्वामी वाद (1991) का सुरक्षा कवच: के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ (1991) में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि CJI की पूर्व-सहमति के बिना किसी भी न्यायाधीश के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज नहीं हो सकती, जिससे स्वतंत्र जांच एजेंसियां लाचार हो जाती हैं।

3. संस्थागत सुधार: स्वायत्तता बनाम जवाबदेही का संतुलन

न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ निरपेक्ष अनुत्तरदायित्व नहीं हो सकता। भारत में न्यायिक जवाबदेही और इन-हाउस तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए वैश्विक मानकों के अनुरूप स्वतंत्र व पारदर्शी निगरानी तंत्र स्थापित करना होगा।

मापदंड वर्तमान इन-हाउस तंत्र (1999) प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायिक परिषद मॉडल
कानूनी आधार सुप्रीम कोर्ट का आंतरिक प्रशासनिक संकल्प संसदीय विधि द्वारा समर्थित सांविधिक निकाय
संरचना केवल आसीन न्यायाधीश (Self-policing) वरिष्ठ न्यायाधीश, प्रतिष्ठित विधिवेत्ता एवं स्वतंत्र अन्वेषक
पारदर्शिता अति-गोपनीय, निष्कर्ष जनता से छिपाए जाते हैं वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट एवं मानकीकृत जांच समय-सीमा
अनुशासनात्मक विकल्प कार्य आवंटन रोकना या महाभियोग सिफारिश लिखित चेतावनी, निलंबन, वित्तीय कटौती एवं पदमुक्ति संस्तुति

4. आगे की राह (Way Forward)

01
न्यायिक मानक विधेयक पुनरुद्धार

2010 के न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक को संशोधित रूप में पुनः संसद में पारित किया जाए।

02
रोस्टर आवंटन का कम्प्यूटरीकरण

केस आवंटन प्रणाली को मानव-हस्तक्षेप मुक्त एवं पारदर्शी एल्गोरिदम पर आधारित किया जाए।

03
समयबद्ध जांच प्रोटोकॉल

शिकायतों के सत्यापन और प्राथमिक जांच के लिए 60 से 90 दिनों की वैधानिक सीमा निर्धारित हो।

04
नागरिक विश्वास की बहाली

यह सुनिश्चित किया जाए कि भारत में न्यायिक जवाबदेही और इन-हाउस तंत्र न्यायपालिका की गरिमा और जन-विश्वास को सुदृढ़ करे।

🎯 परीक्षा अभ्यास कॉर्नर (Exam Practice Corner)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC Standard):
न्यायपालिका के संदर्भ में, 1999 की 'इन-हाउस प्रक्रिया' (In-House Procedure) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के विरुद्ध कदाचार की शिकायतों की जांच हेतु एक वैधानिक तंत्र है।
2. के. वीरास्वामी वाद (1991) के तहत किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने से पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश का परामर्श अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

सही उत्तर: केवल 2
विस्तृत व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि 1999 की इन-हाउस प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण पीठ के संकल्प पर आधारित एक आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था है, इसे किसी संसदीय कानून द्वारा वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है। कथन 2 सही है क्योंकि 1991 के ऐतिहासिक के. वीरास्वामी मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अनिवार्य किया था कि उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों के विरुद्ध प्राथमिकी या जांच से पूर्व CJI की अनुमति आवश्यक है।

UPSC CSE Prelims PYQ (2019):
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर महाभियोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा में 100 सदस्यों अथवा राज्यसभा में 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
2. यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष/सभापति द्वारा तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

सही उत्तर: 1 और 2 दोनों
व्याख्या: न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 की धारा 3 के अनुसार, प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है तथा आरोपों की जांच के लिए गठित 3-सदस्यीय समिति की संरचना में मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
✍️ मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर संरचना (GS Paper 2)

प्रश्न: "न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है, किंतु यह निरपेक्ष अनुत्तरदायित्व का आवरण नहीं बन सकती।" हालिया विवादों के आलोक में भारत में न्यायिक जवाबदेही तंत्र की सीमाओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए तथा संस्थागत सुधारों का सुझाव दीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर संरचना (Blueprint):
  • प्रस्तावना (30 शब्द): संविधान के मूल ढांचे के रूप में न्यायिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 124(4) एवं 217(1) में महाभियोग के प्रावधानों का संक्षिप्त उल्लेख।
  • मुख्य भाग - भाग 1: वर्तमान तंत्र की सीमाएं (90 शब्द): 1999 इन-हाउस प्रक्रिया की गैर-सांविधिक प्रकृति, के. वीरास्वामी वाद के कारण एफआईआर की कठिनाई, मास्टर ऑफ द रोस्टर विवेकाधिकार, कोलेजियम अपारदर्शिता।
  • मुख्य भाग - भाग 2: आवश्यक सुधार (90 शब्द): स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायिक शिकायत आयोग, आंतरिक आचार संहिता का वैधीकरण, डिजिटल केस आवंटन, यूनाइटेड किंगडम की JAC (Judicial Appointments Commission) व अनुशासनात्मक समीक्षा प्रणाली से सीख।
  • निष्कर्ष (40 शब्द): विधि के शासन (Rule of Law) की संप्रभुता बनाए रखने के लिए न्यायिक स्वायत्तता और जवाबदेही के मध्य एक संतुलित 'संस्थागत सेतु' की स्थापना का आह्वान।
GS Paper 2: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह, भारत के हित एवं विदेश नीति

2. दुनिया को सशक्त बनाने के लिए ब्रिक्स 'POWER' का उपयोग: 18वां नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 2026

12-13 सितंबर 2026 को भारत की अध्यक्षता में आयोजित होने जा रहा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में एक मील का पत्थर सिद्ध होने जा रहा है। चीनी राजदूत शू फेइहॉन्ग (Xu Feihong) द्वारा प्रस्तावित पांच-आयामी दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ आर्थिक सहयोग किस प्रकार पारंपरिक पश्चिमी-केंद्रित वित्तीय संस्थाओं के समक्ष एक न्यायसंगत विकल्प प्रस्तुत कर रहा है।

1. 18वें नई दिल्ली शिखर सम्मेलन का सामरिक संदर्भ

कज़ान (रूस) 2024 विस्तार के बाद ब्रिक्स का यह नई दिल्ली सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे प्रमुख राष्ट्र शामिल हैं। यह मंच प्रमाणित करता है कि 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ आर्थिक सहयोग वैश्विक जीडीपी (पीपीपी आधार पर) के 37% से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हुए एक निर्णायक शक्ति बन चुका है।

जनसंख्या एवं बाजार का विशाल दायरा

विस्तारित ब्रिक्स विश्व की 45% से अधिक आबादी और वैश्विक कच्चे तेल उत्पादन के 40% से अधिक हिस्से को नियंत्रित करता है।

डी-डॉलरीकरण एवं स्थानीय मुद्रा व्यापार

द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर निर्भरता घटाने के लिए ब्रिक्स पे (BRICS Pay) और स्थानीय मुद्रा निपटान तंत्र का विस्तार प्रमुख एजेंडा है।

भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में सुधार

पूर्वी लद्दाख में सैन्य वापसी के बाद यह सम्मेलन दोनों एशियाई महाशक्तियों के मध्य बहुपक्षीय आर्थिक सहयोग का नया द्वार खोलता है।

2. शू फेइहॉन्ग द्वारा प्रस्तावित 'POWER' का 5-स्तंभीय ढांचा

चीन के राजदूत द्वारा प्रतिपादित 'POWER' रणनीति ब्रिक्स को टकराववादी गुट के बजाय विकासवादी उत्प्रेरक के रूप में स्थापित करती है। 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ आर्थिक सहयोग की सफलता इस मॉडल के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर टिकी है:

P
Principle (सिद्धांत)

संयुक्त राष्ट्र चार्टर की केंद्रीयता, संप्रभु समानता और आधिपत्यवाद (Hegemonism) व शून्य-योग भू-राजनीति का विरोध।

O
Openness (खुलापन)

समावेशी सहयोग, गैर-गुटीय दृष्टिकोण तथा 'ब्रिक्स प्लस' प्रारूप के माध्यम से विकासशील देशों को जोड़ना।

W
Win-Win (पारस्परिक लाभ)

व्यापार उदारीकरण, आपूर्ति श्रृंखला मजबूती, खाद्य-ऊर्जा सुरक्षा और न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) का पूंजी विस्तार।

E & R
Engine & Responsibility

Engine: हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था व AI गवर्नेंस। Responsibility: IMF/World Bank कोटा सुधार।

3. ग्लोबल साउथ के लिए संस्थागत और रणनीतिक लाभ

ब्रिक्स समूह केवल विचार-मंथन का मंच नहीं रह गया है, बल्कि यह ठोस संस्थागत अवसंरचनाएं विकसित कर रहा है। 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ आर्थिक सहयोग के प्रमुख संस्थागत घटक नीचे दिए गए हैं:

  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): शंघाई स्थित एनडीबी ने अब तक सदस्य देशों में सतत विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए $35 बिलियन से अधिक का ऋण स्वीकृत किया है।
  • आकस्मिक विदेशी मुद्रा आरक्षित व्यवस्था (CRA): वैश्विक तरलता संकट और अल्पकालिक भुगतान संतुलन समस्याओं से निपटने हेतु $100 बिलियन का सुरक्षा तंत्र।
  • ग्लोबल साउथ की आवाज का सशक्तिकरण: जी-20 में अफ्रीकी संघ के स्थायी प्रवेश के बाद ब्रिक्स मंच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता सुधारों की मांग को तेज कर रहा है।

4. चुनौतियां और संतुलन की आवश्यकता

ब्रिक्स के समक्ष आंतरिक विषमताएं एक बड़ी चुनौती हैं। भारत का रुख 'गुट-निरपेक्ष' और रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है, जबकि कुछ अन्य सदस्य इसे पश्चिम-विरोधी (Anti-West) मंच में बदलने का प्रयास करते हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ आर्थिक सहयोग का नेतृत्व करते हुए इसे पश्चिम-विरोधी नहीं बल्कि 'गैर-पश्चिमी' (Non-Western) विकासात्मक मंच बनाए रखे।

🎯 परीक्षा अभ्यास कॉर्नर (Exam Practice Corner)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC Standard):
न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और ब्रिक्स के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना 2014 के फोर्टालेजा शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षरित समझौते के तहत की गई थी।
2. एनडीबी में प्रत्येक संस्थापक सदस्य (BRICS) की मतदान शक्ति उसके द्वारा धारित शेयरों के अनुपात में भिन्न होती है।
3. मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात एनडीबी के गैर-संस्थापक सदस्य देशों में शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

सही उत्तर: केवल 1 और 3
विस्तृत व्याख्या: कथन 1 सही है (2014 फोर्टालेजा घोषणा)। कथन 2 गलत है क्योंकि विश्व बैंक/आईएमएफ के विपरीत, एनडीबी के संस्थापक सदस्यों के पास 'एक देश, एक वोट' का सिद्धांत है और किसी भी देश के पास वीटो पावर नहीं है। कथन 3 सही है क्योंकि मिस्र, यूएई, बांग्लादेश और उरुग्वे एनडीबी के सदस्य के रूप में शामिल किए गए हैं।

UPSC CSE Prelims PYQ (2015):
'फोर्टालेजा घोषणा' (Fortaleza Declaration) जो कभी-कभी समाचारों में देखी जाती है, निम्नलिखित में से किसके मामलों से संबंधित है?
(a) आसियान (ASEAN)
(b) ब्रिक्स (BRICS)
(c) ओईसीडी (OECD)
(d) विश्व व्यापार संगठन (WTO)

सही उत्तर: (b) ब्रिक्स (BRICS)
व्याख्या: 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में फोर्टालेजा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था (CRA) की स्थापना हुई थी।
✍️ मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर संरचना (GS Paper 2)

प्रश्न: "विस्तारित ब्रिक्स समूह केवल भू-आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित वैश्विक शासन प्रणाली में संरचनात्मक बदलाव का अग्रदूत है।" 2026 नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के संदर्भ में भारत के रणनीतिक हितों और चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर संरचना (Blueprint):
  • प्रस्तावना (30 शब्द): 18वें ब्रिक्स नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 2026 की पृष्ठभूमि, वैश्विक जीडीपी (37%) व ऊर्जा नियंत्रण में विस्तारित ब्रिक्स का उल्लेख।
  • मुख्य भाग - भाग 1: वैश्विक शासन प्रणाली में बदलाव (80 शब्द): ब्रेटन वुड्स संस्थाओं (IMF/WB) की विफलता, डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती, स्थानीय मुद्रा निपटान, एनडीबी का अवसंरचना वित्तपोषण।
  • मुख्य भाग - भाग 2: भारत के रणनीतिक हित एवं चुनौतियां (100 शब्द): - हित: ग्लोबल साउथ के निर्विवाद नेता के रूप में उभरना, ऊर्जा सुरक्षा (पश्चिम एशिया ब्रिक्स सदस्यों से), चीन के साथ संबंधों में स्थिरता।
    - चुनौतियां: मंच के 'पश्चिम-विरोधी' ध्रुवीकरण को रोकना, क्वाड (QUAD) और आई2यू2 (I2U2) के साथ ब्रिक्स का कूटनीतिक संतुलन साधना।
  • निष्कर्ष (40 शब्द): भारत की 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) नीति और समावेशी बहुपक्षवाद के माध्यम से वैश्विक शांति व आर्थिक स्थिरता की दिशा में मार्गदर्शन।
GS Paper 3: भारतीय अर्थव्यवस्था, मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति एवं रोजगार सृजन

3. क्या भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण वास्तव में कारगर है? एक दशक का अनुभवजन्य विश्लेषण

वर्ष 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा अपनाए गए लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (Flexible Inflation Targeting - FIT) ढांचे को अब एक दशक पूरा हो चुका है। रोहित आज़ाद और इंद्रनील चौधरी का यह अनुभवजन्य अध्ययन यह जांचता है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण और फिलिप्स वक्र का नव-केनेसियन (New Keynesian) सिद्धांत भारत की संरचनात्मक वास्तविकताओं से मेल खाता है या यह औद्योगिक विकास की कीमत पर काम कर रहा है।

1. लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) ढांचा: उद्देश्य एवं तंत्र

उर्जित पटेल समिति की संस्तुतियों पर 2016 में आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत 6-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन किया गया, जिसे 4% (+/- 2%) उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति बनाए रखने का दायित्व सौंपा गया। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण और फिलिप्स वक्र के अंतर्संबंधों को समझे बिना केवल ब्याज दरों में वृद्धि करना आर्थिक ठहराव का जोखिम पैदा कर सकता है।

रेपो दर का संचरण तंत्र

नीतिगत ब्याज दर (Repo Rate) बढ़ाकर कुल मांग (Aggregate Demand) को कम करना और मुद्रास्फीति अपेक्षाओं को नियंत्रित करना।

नव-केनेसियन फिलिप्स वक्र (NKPC)

यह सिद्धांत मानता है कि आर्थिक विकास/रोजगार में तेजी से मजदूरी बढ़ती है, जिससे मांग-जनित मुद्रास्फीति (Demand-pull Inflation) उत्पन्न होती है।

मूल्य स्थिरता बनाम आर्थिक विकास

केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आर्थिक उत्पादन के अंतर (Output Gap) को कम करने का प्रयास करता है।

2. भारत में फिलिप्स वक्र (Phillips Curve) सपाट (Flat) क्यों है?

संपादकीय के लेखकों ने पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह प्रमाणित किया है कि भारत में फिलिप्स वक्र अत्यंत सपाट (Statistically Insignificant / Flat) है। इसके प्रमुख संरचनात्मक कारण निम्नलिखित हैं:

  • अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की अधिकता (>92% श्रमबल): भारत में अधिकांश श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं जहां सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) की शक्ति नगण्य है। विकास दर बढ़ने पर भी वास्तविक मजदूरी में तेज वृद्धि नहीं होती।
  • आपूर्ति-पक्षीय मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation): भारत में खुदरा मुद्रास्फीति (Headline CPI) का लगभग 45-50% हिस्सा खाद्य एवं ईंधन टोकरी से आता है। इस पर ब्याज दरों की बढ़ोतरी का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता (जैसे टमाटर, प्याज या कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों पर रेपो दर बेअसर है)।
  • घरेलू मुद्रास्फीति अपेक्षाओं का भटकाव: परिवारों की मुद्रास्फीति प्रत्याशाएं मुख्य रूप से आवश्यक खाद्य वस्तुओं के दैनिक दामों से तय होती हैं, न कि आरबीआई के नीतिगत बयानों से।
  • निवेश पर नकारात्मक प्रभाव: रेपो दर बढ़ाने से औपचारिक उद्योगों की ऋण लागत बढ़ती है, जिससे निजी पूंजी निवेश (Private Capex) और क्षमता विस्तार बाधित होता है।

3. संरचनात्मक तुलना: सिद्धांत बनाम भारतीय धरातल

घटक विकसित अर्थव्यवस्थाएं (FIT मॉडल) भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविकता
श्रम बाजार संगठित, उच्च सौदेबाजी शक्ति, वेतन-मूल्य सर्पिल 92% अनौपचारिक, मूल्य-स्वीकर्ता (Price-takers), स्थिर मजदूरी
मुद्रास्फीति का स्रोत मांग-प्रेरित (Demand-pull), कोर सेक्टर चालित आपूर्ति-जनित (Cost-push), खाद्य व ईंधन झटकों से प्रेरित
नीतिगत दर का प्रभाव उपभोक्ता ऋण व आवास मांग को प्रभावी रूप से दबाता है खाद्य कीमतों पर बेअसर; केवल औद्योगिक निवेश व उत्पादन को मंद करता है
फिलिप्स वक्र ढलान तीव्र (Steep) - बेरोजगारी व मुद्रास्फीति में स्पष्ट ट्रेड-ऑफ सपाट (Flat) - उत्पादन वृद्धि मुद्रास्फीति का मुख्य कारक नहीं

4. समग्र नीतिगत सुधार और आगे की राह

लेखक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण और फिलिप्स वक्र की सीमाओं को देखते हुए अकेले मौद्रिक नीति पर अत्यधिक निर्भरता के स्थान पर राजकोषीय और आपूर्ति-पक्षीय प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

01
रणनीतिक बफर स्टॉक

दालों, तिलहन और आवश्यक सब्जियों के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF) और विकेंद्रीकृत शीत भंडारण का विस्तार।

02
राजकोषीय-मौद्रिक समन्वय

आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं को दूर करने के लिए लक्षित सार्वजनिक निवेश और रसद लागत (Logistics Cost) में कमी।

03
कोर मुद्रास्फीति पर पुनर्विचार

आरबीआई को खाद्य झटकों के दौरान तुरंत कठोर मौद्रिक नीति अपनाने से बचना चाहिए ताकि विकास की गति न रुके।

04
अनौपचारिक क्षेत्र का सुदृढ़ीकरण

उत्पादकता बढ़ाकर वास्तविक मजदूरी में वृद्धि करना ताकि आर्थिक लचीलापन और क्रय शक्ति मजबूत हो सके।

🎯 परीक्षा अभ्यास कॉर्नर (Exam Practice Corner)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (UPSC Standard):
मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee - MPC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह आरबीआई अधिनियम, 1934 के तहत गठित एक 6-सदस्यीय सांविधिक निकाय है।
2. केंद्रीय वित्त मंत्री इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
3. समिति को वर्ष में कम से कम चार बार बैठक करना अनिवार्य है तथा इसका निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है जिसमें गतिरोध होने पर गवर्नर को निर्णायक मत (Casting Vote) का अधिकार होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

सही उत्तर: केवल 1 और 3
विस्तृत व्याख्या: कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि आरबीआई के गवर्नर मौद्रिक नीति समिति (MPC) के पदेन अध्यक्ष होते हैं, न कि वित्त मंत्री। समिति में 3 सदस्य आरबीआई से और 3 बाह्य सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।

UPSC CSE Prelims PYQ (2020):
यदि आरबीआई विस्तारवादी मौद्रिक नीति (Expansionary Monetary Policy) अपनाने का निर्णय लेता है, तो वह निम्नलिखित में से क्या नहीं करेगा?
1. वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) को कम करना और अनुकूलित करना।
2. सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर को बढ़ाना।
3. बैंक दर और रेपो दर को कम करना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

सही उत्तर: (b) केवल 2
व्याख्या: विस्तारवादी मौद्रिक नीति (सस्ती मुद्रा नीति) का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में तरलता और ऋण प्रवाह को बढ़ाना होता है। इसके लिए आरबीआई नीतिगत दरों (रेपो, बैंक दर, SLR) को घटाता है। MSF दर को बढ़ाना तरलता को संकुचित करता है (संकुचनकारी नीति), अतः आरबीआई इसे नहीं करेगा।
✍️ मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न एवं उत्तर संरचना (GS Paper 3)

प्रश्न: "भारत में मुद्रास्फीति की प्रकृति मुख्य रूप से आपूर्ति-जनित है, जबकि मौद्रिक नीति का उपकरण मुख्य रूप से मांग-प्रबंधन पर केंद्रित है।" लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) के पिछले एक दशक के अनुभवों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। क्या भारत को अपनी मौद्रिक नीति रूपरेखा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है? (250 शब्द, 15 अंक)

मॉडल उत्तर संरचना (Blueprint):
  • प्रस्तावना (30 शब्द): 2016 के मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क समझौते और 4% (+/- 2%) सीपीआई लक्ष्यीकरण का संक्षिप्त परिचय।
  • मुख्य भाग - भाग 1: आपूर्ति-जनित मुद्रास्फीति बनाम ब्याज दर अस्त्र (80 शब्द): खाद्य व ईंधन घटकों का भारी भारांश (45-50%), कृषि मौसम व भू-राजनीतिक कारक, अनौपचारिक श्रम बाजार में सपाट फिलिप्स वक्र।
  • मुख्य भाग - भाग 2: FIT की उपलब्धियां एवं विफलताएं (80 शब्द): - उपलब्धियां: मुद्रास्फीति प्रत्याशाओं का स्थिरीकरण, विदेशी निवेशकों का विश्वास, मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता।
    - सीमाएं: उच्च ब्याज दरों के कारण औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन की धीमी गति।
  • निष्कर्ष (40 शब्द): 'केनेसियन ब्याज दर प्रबंधन' और 'संरचनात्मक आपूर्ति-पक्षीय सुधारों' के समन्वय पर आधारित समग्र आर्थिक नीति का सुझाव।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. 1999 की न्यायिक इन-हाउस प्रक्रिया की मुख्य सीमाएं क्या हैं? ▼
1999 की इन-हाउस प्रक्रिया केवल एक आंतरिक प्रशासनिक संकल्प है जिसे कोई वैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है। इसमें जांच पूरी करने की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं होती, रिपोर्ट को गोपनीय रखा जाता है और महाभियोग के अलावा कोई मध्यवर्ती अनुशासनात्मक तंत्र नहीं है।
2. 2026 ब्रिक्स नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में 'POWER' रणनीति क्या दर्शाती है? ▼
'POWER' रणनीति पांच प्रमुख स्तंभों को समाहित करती है: Principle (सच्चा बहुपक्षवाद), Openness (समावेशी खुलापन), Win-Win (व्यापार और स्थानीय मुद्रा निपटान में पारस्परिक लाभ), Engine (हरित व डिजिटल नवाचार), और Responsibility (वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में संरचनात्मक सुधार)।
3. भारतीय अर्थव्यवस्था में फिलिप्स वक्र (Phillips Curve) सपाट (Flat) क्यों पाया जाता है? ▼
भारत में 92% से अधिक श्रमबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है जिसके पास सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति का अभाव है। अतः आर्थिक वृद्धि के दौरान भी मजदूरी-मूल्य सर्पिल नहीं बनता। साथ ही, मुद्रास्फीति मांग के बजाय खाद्य एवं ईंधन आपूर्ति झटकों से प्रेरित होती है।
4. के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ (1991) निर्णय का क्या महत्व है? ▼
इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया था कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के आसीन न्यायाधीश के विरुद्ध किसी भी आपराधिक मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने या जांच आरंभ करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से पूर्व परामर्श और अनुमति लेना अनिवार्य है।
5. भारत में लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (FIT) ढांचा कब और किसके तहत स्थापित हुआ था? ▼
लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचा वर्ष 2016 में उर्जित पटेल समिति की सिफारिशों के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन करके स्थापित किया गया था। इसका वैधानिक लक्ष्य 4% (+/- 2% सहनशीलता बैंड) सीपीआई मुद्रास्फीति बनाए रखना है।

© 2026 The Hindu Editorial Analysis Hub. UPSC / State PCS परीक्षा तैयारी हेतु विशेष रूप से संकलित।

Focus Keyphrase: The Hindu Editorial Today in Hindi 7 September 2026

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